छत्तीसगढ़ पर मराठों का आक्रमण - एक ऐतिहासिक अवलोकन

 

डॉ. डी. एन. खुटे

सहायक प्राध्यापक, इतिहास अध्ययनशाला, पं. रविषंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर ..

*Corresponding Author E-mail: dnkhute@gmail.com

 

ABSTRACT:

सारांषः- अठारहवीं शताब्दी के पांचवे दशक में छत्तीगढ़ पर मराठा आक्रमण की सही तिथि क्या थी, इस पर इतिहासकारों में मतभेद है। मराठा इतिहासकार सर देसाई के अनुसार आक्रमण का प्रारंभ 1741 ई. के दशहरा दिवस से हुआ। दल के मुखिया भास्कर राव पंत थे। यह उल्लेखनीय है कि बरसात के पश्चात् दशहरा के दिन से ही मराठों का आक्रमण प्रारंभ होता था। 1741 ई. सितंबर व अक्टूबर माह से आक्रमणकारी मराठा सेना छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ी। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार ग्रान्ट डफ के अनुसार यह तिथि 1742 ई. थी। छत्तीसगढ़ के अंग्रेज सुप्रिन्टेन्डेन्ट पी.वान्स एगेन्यू (1818-1825 ई.) ने रतनपुर पर मराठा आक्रमण लिखा है। रतनपुर के स्थानीय इतिहासकार पं. शिवदत्त शास्त्री के अनुसार संवत् 1798 के साल में पेशवा के हुकुम से भास्कर पंत बुन्देलखण्ड होते पेन्डरा की तरफ से रतनपुर में आए, बंगाल जाने लगे जब रतनपुर की लड़ाई अमल करे। बाबू रेवाराम ने भी इतिहास लिखा है, उन्होंने आक्रमण वर्ष 1741 ई. लिखा है। छत्तीसगढ़ पर मराठों के शासन पर शोध करने वाले ज्ञानेश्वर प्रसाद शर्मा ने 1741 ई. में आक्रमण माना है। छत्तीसगढ़ में मराठा शासन और बिंबाजी भोंसले पर शोध करने वाले डॉ. मुकुंद रंगनाथ ने सन् 1741 ई. में आक्रमण माना है। डॉ. पी.एल. मिश्र भी 1741 ई. में आक्रमण मानते है। नवीनतम खोजों में 1741 ई. की तिथि सही लगती है। विवाद इसलिए उठा कि मराठों ने एक बार नहीं अनेक बार आक्रमण किया। इस अंचल से सेना सहित प्रयाण किया। छत्तीसगढ़ पर मराठों का आक्रमण 1741 ई. में हुआ क्योंकि 1742 ई. के प्रारंभिक तिमाही में भास्कर राव पंत पं.बंगाल और बिहार को लूटने में लगे थें। मराठा सेनापति भास्कर राव पंत के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ और बंगाल पर आक्रमण के लिए जो सेना भेजी गई, उसकी संख्या पर भी विवाद है। सरदेसाई और गा्रंटडफ के अनुसार सेना की संख्या 10,000 थी। गंगाराम नामक समकालीन बंगाली कवि ने सेना की संख्या 40,000 मराठे घुड़सवार बताया है। बाखर के अनुसार 30,000 और रायपुर गजेटियर के अनुसार संख्या 40,000 थी। डॉ. पी.एल. मिश्र ने मत व्यक्त किया है -On the assessment of the fact we come to the conlusion that Bhaskar Pant invaded chhattisgarh region in 1741 with 30000 troops. इस तथ्य के आकलन पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भास्कर पंत ने 1741 में 30000 सैनिकों के साथ छत्तीसगढ़ क्षेत्र पर आक्रमण किया था। तथ्यों पर गवेषणा पूर्वक विचार करने पर 30,000 की सैन्य संख्या सही होता प्रतीत है। भास्कर पंत को छत्तीसगढ़. से आगे बढ़कर बंगाल प्रांत पर भी आक्रमण करना था जो कि अलीवर्दी खां के अधीन एक षक्तिषाली राज्य था, अतः एक बड़ी सेना लेकर ही मराठा सेनापति आया होगा।

 

KEYWORDS: मराठा, सुप्रिन्टेन्डेन्ट, गजेटियर, अलीवर्दी खां, भास्कर पंत, रतनपुर, सेना साहब सूबा, सनद, रघुनाथ सिंह, मोहन सिंह, मीर हबीब, पेंड्रा, लक्ष्मण कुंवर, पद्म कुंवर।

 

 

 

 

प्रस्तावना:-

छत्तीसगढ़ पर मराठों का आक्रमण अंचल के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी, इस अंचल पर उस समय कलचुरियों का शासन था। कलचुरि घराने की एक शाखा लगभग 1000 ई. में तुम्माण नगर को राजधानी बनाकर शासन करती थी। तुम्माण नगर बिलासपुर जिला मुख्यालय से लगभग 5.5 मील की दूरी पर ईशान कोण में स्थित है। सन् 1050 ई. के लगभग कलचुरि वंश के रत्नराज ने अपने नाम पर रतनपुर नामक नगर बसाया और अपनी राजधानी तुम्माण से उठाकर वहां ले गया।1 1050 ई. से रतनपुर राजधानी के रूप में रहा। इसी राजधानी रतनपुर के नाम पर यह अंचल रतनपुर कहलाया।2 यह राज्य बहुत ही समृद्ध राज्य था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुगल बादशाह जहांगीर को रतनपुर के कल्चुरि शासन कल्याण साय ने एक लाख रूपए कर के रूप में तथा 80 हाथी भेंट स्वरूप दिए।3 तत्कालीन समय में कल्याण साय के पास 14200 सैनिक तथा 116 हाथी थे। आसपास के राजा इतनी सेना नहीं रख सकते थे। इससे ज्ञात होता है कि छत्तीसगढ़ उस समय समृद्धषाली था। कलचुरियों की शासन पद्धति भी उत्तम थी।4

 

भारतीय इतिहास के संदर्भ में देखने पर ज्ञात होता है कि सन् 1739 ई. से आधुनिक काल का प्रारंभ मानने वालों का एक बड़ा वर्ग है। लगभग इसी समय छत्तीसगढ़ के इतिहास में मोड़ लाने वाली घटना घट रही थी। कलचुरि राजवंश पौराणिक राजवंश था। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी लगभग 1500 सालों तक सतत शासन का प्रमाण मिलता है। कलचुरियों का रतनपुर में पतन इतिहासकारों को व्यथित करने वाला था। चिशोल्म ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है - ‘‘इतिहास में अपेक्षित है कि राजाओं की लम्बी परम्परा का अंतिम व्यक्ति तलवार लेकर देश की रक्षा करते हुए शहीद हो और भावी पीढ़ियों की समृति में देशभक्ति और साहस का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर रहे।‘‘5 चिशोल्म का यह आरोप सही है कि कलचुरि नरेशों को वीरता प्रदर्शित करनी थी। छत्तीसगढ़ पर मराठों का आक्रमण मराठों के दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण था ही, इस अंचल के लोगों के लिए भी अनेक विचारणीय वाला रहा है।

 

मराठो का आक्रमणः-

अठारहवीं शताब्दी के पांचवे दशक में छत्तीगढ़ पर मराठा आक्रमण की सही तिथि क्या थी, इस पर इतिहासकारों में मतभेद है। मराठा इतिहासकार सर देसाई के अनुसार आक्रमण का प्रारंभ 1741 ई. के दशहरा दिवस से हुआ। दल के मुखिया भास्कर राव पंत थे।6 यह उल्लेखनीय है कि बरसात के पश्चात् दशहरा के दिन से ही मराठों का आक्रमण प्रारंभ होता था। 1741 ई. सितंबर व अक्टूबर माह से आक्रमणकारी मराठा सेना छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ी। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार ग्रान्ट डफ के अनुसार यह तिथि 1742 ई. थी।7 छत्तीसगढ़ के अंग्रेज सुप्रिन्टेन्डेन्ट पी.वान्स एगेन्यू (1818-1825 ई.) ने रतनपुर पर मराठा आक्रमण लिखा है।8 रतनपुर के स्थानीय इतिहासकार पं. शिवदत्त शास्त्री के अनुसार संवत् 1798 के साल में पेशवा के हुकुम से भास्कर पंत बुन्देलखण्ड होते पेन्डरा की तरफ से रतनपुर में आए, बंगाल जाने लगे जब रतनपुर की लड़ाई अमल करे।9 बाबू रेवाराम ने भी इतिहास लिखा है, उन्होंने आक्रमण वर्ष 1741 ई. लिखा है।10 छत्तीसगढ़ पर मराठों के शासन पर शोध करने वाले ज्ञानेश्वर प्रसाद शर्मा ने 1741 ई. में आक्रमण माना है।11 छत्तीसगढ़ में मराठा शासन और बिंबाजी भोंसले पर शोध करने वाले डॉ. मुकुंद रंगनाथ ने सन् 1741 ई. में आक्रमण माना है।12 डॉ.पी.एल.मिश्र भी 1741 ई. में आक्रमण मानते है।13 नवीनतम खोजों में 1741 ई. की तिथि सही लगती है। विवाद इसलिए उठा कि मराठों ने एक बार नहीं अनेक बार आक्रमण किया। इस अंचल से सेना सहित प्रयाण किया। छत्तीसगढ़ पर मराठों का आक्रमण 1741 ई. में हुआ क्योंकि 1742 ई. के प्रारंभिक तिमाही में भास्कर राव पंत पं.बंगाल और बिहार को लूटने में लगे थें।

 

मराठा सेनापति भास्कर राव पंत के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ और बंगाल पर आक्रमण के लिए जो सेना भेजी गई, उसकी संख्या पर भी विवाद है। सरदेसाई और गा्रंटडफ के अनुसार सेना की संख्या 10,000 थी। गंगाराम नामक समकालीन बंगाली कवि ने सेना की संख्या 40,000 मराठे घुड़सवार बताया है। बाखर के अनुसार 30,000 और रायपुर गजेटियर के अनुसार संख्या 40,000 थी। डॉ.पी.एल.मिश्र ने मत व्यक्त किया है - On the assessment of the fact we come to the conlusion that Bhaskar Pant invaded Chhattisgarh region in 1741 with 30000 troops.14 इस तथ्य के आकलन पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भास्कर पंत ने 1741 में 30000 सैनिकों के साथ छत्तीसगढ़ क्षेत्र पर आक्रमण किया था।

 

तथ्यों पर गवेशणा पूर्वक विचार करने पर 30,000 की सैन्य संख्या सही होता प्रतीत है। भास्कर पंत को छत्तीसगढ़. से आगे बढ़कर बंगाल प्रांत पर भी आक्रमण करना था जो कि अलीवर्दी खां के अधीन एक शक्तिशाली राज्य था, अतः एक बड़ी सेना लेकर ही मराठा सेनापति आया होगा।

 

आक्रमण के कारणः-

छत्तीसगढ़ पर मराठा आक्रमण वास्तव में बंगाल पर मराठा आक्रमण की पूर्व पीठिका थी। मराठों की सेना बंगाल पर आक्रमण करने निकली थी। डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने सही लिखा है - सन् 1741 ई. में जबकि नागपुरी भोंसले राज्य की नींव डालने वाले रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत पंडित बंगाल पर धावा करने जा रहे थे, ये बेचारे रतनपुरी कलचुरि नरेश व्यर्थ ही चक्कर में आ गए और बिना लड़े भिड़े ही पंत पंडित के आगे आत्मसमर्पण कर दिया।15 मराठा आक्रमण के कारणों को निम्न शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है-

 

1. मराठों की महत्वाकांक्षा

शिवाजी ने जिस मराठा राज्य की स्थापना की थी, उसका सतत् विस्तार हो रहा था। हर मराठा सरदार राज्य का अधिक विस्तार करना चाहता था। 1734 ई. में सेना साहब सूबा के पद पर रघुजी को नियुक्त किया गया। उसे जो सनद दिया गया उसके अनुसार पूर्व में बंगाल तक का भाग उसके क्षेत्र में शामिल था। छ.ग. प्रांत का भी उल्लेख उस सनद में किया गया था।16 इस सनद में उल्लेखित प्रभाव क्षेत्र तक मराठा प्रभुत्व का विस्तार करना रघुजी का दायित्व बनता था। 1741 ई. में इसी महत्वाकांक्षा की प्रतिपूर्ति के लिए बंगाल विजय करने हेतु मराठा सेना भेजी गई थी। मार्ग में छत्तीसगढ़. का भाग था। भास्कर पंत ने इसे जीतने का निश्चित किया।

 

2. छत्तीसगढ़ का उड़ीसा बंगाल मार्ग पर स्थित होना

सन् 1741 ई. में बंगाल विजय के लिए मराठा सेना भेजी गई। मार्ग पर छत्तीसगढ़ का प्रदेश था। अतः पीछे का भाग सुरक्षित रहे इस उद्देश्य से भास्कर पंत ने इसे जीता। ज्ञानेश्वर शर्मा ने लिखा है -यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भोंसले ने बिनाकिसी उकसावे के शांतिप्रिय पड़ोसी (छत्तीसगढ़) पर हमला किया। बंगाल जाने के मार्ग पर छत्तीसगढ़ पड़ता था, अतः उसे जीता गया।17

 

3. रघुजी भोंसला की ऋणग्रस्तता

रघुजी भोंसला सेना साहब सूबा के पद पर नियुक्त थे। मराठा प्रभाव विस्तार के दौर दौरा में उन्हें एक बड़ी सेना रखनी पड़ी थी। इस सेना के खर्च के लिए उन्हें ऋण लेना पड़ा था।18 सन् 1742 के लगभग भी रघुजी ऋणग्रस्त थे।19 ऋण से मुक्ति पाने का एक ही मार्ग था, वह था आसपास के राज्यों को लूटने के उद्देश्य से सेना भेजी गई थी। इस सूची में भी छत्तीसगढ़ का प्रदेश शामिल था। यही कारण था कि कलचुरियों से कोई लड़ाई का कराण न होते हुए भी उकसाने वाली कोई कार्यवाही कलचुरियों द्वारा न किए जाने के बावजूद मराठा सेना ने लूट के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ पर आक्रमण किया। वास्तव में रघुजी ऋण मुक्त होने का उपक्रम कर रहे थे।

 

4. छत्तीगसढ़ का उपजाउपन होना

आक्रमणकारी उसी अंचल पर आक्रमण करता है जो धनी इलाका हो, क्षेत्र उपाजाउ हो, जिससे लगान के रूप में प्रतिवर्ष बड़ी राशि वसूल की जा सके। छत्तीसगढ़ के उपजाउ खेतों के बारे में मराठों को ज्ञात था। यहां की वन संपदा और उपजाउ खेत आक्रमण कारियों को आकर्शित करते थे। प्यारे लाल गुप्त ने लिखा है - छत्तीसगढ़ पर मराठों की शुरू से नजर थी, लालच भरी, वन पहाड़ों से आच्छादित यह अंचल यद्यपि धनी नहीं समझा जाता था, पर धान तथा वनोपज ने इसे लुभावना बना दिया था।20

5. छत्तीसगढ़ का कमजोर शासक होना

मराठे जिन बंगाल की व्यूह रचना में लगे थे, उन दिनों रतनपुर के हैहय कलचुरियों का शासक रघुनाथ सिंह कमजोर था। रघुनाथ सिंह 1732 ई. में 60 साल की अवस्था में रतनपुर के राजसिंहासन पर बैठा।21 सन् 1740 ई. के लगभग उसका एकमात्र पुत्र मर गया। वे अत्यंत शोक संतप्त हो गए। एक साल तक उन्होंने राजकाज तक देखना बंद कर दिया था।22 एक तो यों ही निर्बल मन का मनुष्य उस पर बुढ़ापा, फिर पुत्र शोक, उसने राज्य बचाने का कोई प्रयास नहीं किया।23 मराठों को रतनपुर और उसके शासक के बारे में जानकारी मिलती रहती थी। उन्होंने अच्छा अवसर समझा और बंगाल जाते-जाते रतनपुर के राजा को भी परास्त किया। दंड स्वरूप धन भी वसूल किया। लगभग 70 साल के रघुनाथ सिंह आक्रमण का सामना करने की स्थिति में नहीं थे। रतनपुर के रघुनाथसिंह और रायपुर के अमरसिंह देव के समय में मध्यप्रांत पर नागपुर के भोसलों का अधिकार हो गया था। उस समय मराठों से टक्कर लेने में प्रायः भारतीय राजागण कांपते थे, जिस समय मराठों ने रतनपुर और रायपुर पर आक्रमण किया उस समय किसी ने चूं तक न किया।24

 

6. छत्तीसगढ़ के राज परिवारों में फूट-

1741 ई. में मराठा आक्रमण के समय रतनपुर के कलचुरि और रायपुर के कलचुरि और रायपुर के कलचुरियों में मेल नहीं था। रायपुर शाखा के मोहनसिंह बड़े महत्वाकांक्षी थे। रतनपुर पर भी वे अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे। यह भी संभव है कि मोहनसिंह के कुचक्रों के कारण रतनपुर की सेना ने अपने वृद्ध राजा का साथ ही न दिया हो।25 मोहनसिंह का नागपुर से सतत् संपर्क था। बहुत संभव है कि उन्होंने ही मराठों को रतनपुर पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया हो। कलचुरियों का दुर्भाग्य था कि ऐसा पीढ़ी राज कर रही थी, जिनमें मेल नहीं था। सन् 1020 ई. के लगभग कलिंगराज का बेटा कमलराज तुम्माण की गद्दी पर बैठा। इसके समय में त्रिपुरी के गांगेय देव कलचुरि ने उड़ीसा पर आक्रमण किया, जिसमें कमलराज ने ना केवल उसकी सहायता की बल्कि उत्कलराज की संपत्ति लूटकर गांगेयदेव को समर्पित कर दी थी।26 ऐसी एकता ही राज परिवारों में प्रशंसनीय होती है, कलचुरि शासकों की फूट का लाभ मराठों ने उठाया। मोहनसिंह संदेह के घेरे में इसलिए भी आता है कि उसने मराठों के आक्रमण के समय रतनपुर के राजा की कोई सहायता नहीं की। 1741 ई. में रघुजी भोंसले और उनके साथ कलचुरि वंश का एक व्यक्ति जिसका नाम मोहनसिंह था, इसी के द्वारा रतनपुर पर आक्रमण किया गया जिससे कलचुरि वंश का रहा सहा अस्तित्व समाप्त हो गया। अंतिम शासक रघुनाथ सिंह रतनपुर की गद्दी से हटाए गए।27 इससे भी स्पष्ट होता है कि 1741 ई. के आक्रमण के पीछे रायपुर के मोहनसिंह का हाथ था।

 

7. छत्तीसगढ़ के जमींदारों का असहयोगी रूख-

छत्तीसगढ़ के रतनपुर पर आक्रमण से पूर्व मराठों ने यहां की आंतरिक दुर्बलता का पता लगा लिया था। रतनपुर राज्य निर्बल हो चला था। उनके गढ़ों के दीवान उनका खुल्लम-खुल्ला विरोध करने लगे थे। यहां तक की जिस भूमि पर राजा का अधिकार था, उसे भी वे कहीं-कहीं दबा बैठे थे। छुरी और पंडरिया के जमींदारों ने ऐसी बहुत सी जमीन दबा ली थी। गोंड, कंवर और बिझवारों ने हैहय वंष के आरंभ से उनसे खंड प्राप्त किए थे पर परीक्षा की घड़ी आने पर उन्होंने न केवल कोरा जवाब ही दिया, बल्कि विरोध करने के लिए खड़े हो गए।28

 

8. मीर हबीब का आमंत्रण

छत्तीसगढ़ पर मराठों के आक्रमण का एक कारण मीर हबीब का मराठों को भेजा आमंत्रण था। मीर हबीब का बंगाल के तत्कालीन नवाब से नहीं पटती थी, उसने मराठों को बंगाल पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया और हर संभव सहायता देने की पेशकश की। छत्तीसगढ़. पर मराठा आक्रमण संबंधी शोध कार्य करने वाले ज्ञानेष्वर प्रसाद शर्मा ने लिखा है - हालांकि छत्तीसगढ़ पर मराठा आक्रमण का मुख्य कारण बंगाल के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए मीर हबीब का निमंत्रण था।29

 

रतनपुर पर आक्रमण

सन् 1741 ई. में रतनपुर पर भास्कर पंत के नेतृत्व में मराठों का आक्रमण हुआ। प्यारेलाल गुप्त ने लिखा है - भास्कर पंत ने सेना सहित बुन्देलखण्ड होते हुए पेंड्रा की ओर से छत्तीसगढ़. में प्रवेश किया और ससैन्य रतनपुर पहुंचे और बिना प्रयास उसे अपने अधिकार में ले लिया।30

भास्कर राव पंत को बंगाल पर आक्रमण का आदेश हुआ। भोंसले की सेना बुन्देलखण्ड होते हुए बिहार, बंगाल जा सकती थी या दूसरा रास्ता था पूर्वी मार्ग का जो लांजी, दर्रे, रायपुर, सारंगढ़, संबलपुर, उड़ीसा होते बिहार का था। भास्कर पंड़ित सीधे बुन्देलखण्ड पहुंचे।31

 

बाबू गोकूल प्रसाद ने लिखा है - सन् 1741 ई. में जब मराठे छत्तीसगढ़. पर चढ़े थे, तब उन्होंने अपना केंद्र दुर्ग के किले को बनाया था।32 पं, शिवदत्त शास्त्री के रतनपुर आख्यान के समान ही बाबू रेवाराम की लेखनी उल्लेखनीय है, उन्होंने लिखा है -

            संवत् से सत्रह, गयउ पर नब्बे पांच

            छत्तीसगढ़ पुनाध निहि लिए बात यह सांच।

            भास्कर सेनाधीश, तब आई लिए यह रनिज

            बहु दिन नृप रघुनाथ को जम्माने भल काज।33

 

उपरोक्त प्रसंगो का उल्लेख इसलिए आवश्यक हो जाता है कि भास्कर राव पंत का छत्तीसगढ़ आक्रमण सीधा आक्रमण नहीं था। रघुनाथ राव को धोखा देने के लिए मराठा सेना बुन्देलखण्ड तक बढ़ गई, फिर दक्षिण की ओर मुड़़ी। प्रश्न उठता है कि सीधे बुंदेलखंड से आगे बिहार क्यों नहीं गई। मराठे यदि बंगाल पर आक्रमण करने जा रहे थे, तो वापस छत्तीसगढ़. क्यों आए? मराठे रिकार्ड दर्शाते है कि रघुजी ऋण ग्रस्त थे, उन्हें धन की आवश्यकता थी इसलिए रतनपुर के शासक को धन के लिए संदेश भेजा गयां रघुनाथ सिंह ने ध्यान नहीं दिया। मराठा सेना कूच कर गई। बुन्देलखण्ड तक पहुंच गई मगर रघुनाथ सिंह से धन नहीं पहुंचा। मराठा सेना दक्षिण की ओर मुड़ती हैं, दुर्ग दर्पण से पता चलता है कि मराठे वहीं से रतनपुर पर आक्रमण की तैयारी में थे। मोहन सिंह रायपुर के कलचुरि शासकों की परंपरा का था। रायपुर के पास दुर्ग में मराठा सेना ठहरी, लेकिन रायपुर पर आक्रमण न कर रतनपुर पर आक्रमण क्यों की, बात साफ है कि मोहनसिंह मराठों से मिला हुआ था।

 

रघुनाथ सिंह से संधि के प्रयास चल रहे थे। मराठों को आना-जाना रतनपुर में हो रहा था। रघुनाथ सिंह मराठों की शर्ते मानने को तैयार न था। बाबू रेवाराम इशारा करते हैं कि राजा रघुनाथ सिंह को भले कार्य के लिए जमाने में कुछ दिन लग गया। रघुनाथ समय पर धन नहीं जुटा पाए। मराठों का धैर्य जवाब दे रहा था, उन्होंने अचानक आक्रमण कर दिया। इससे दो लाभ हुए, रघुनाथ सिंह को परास्त शासक मानकर उससे अधिक धन वसूला गया, रतनपुर की जनता से भी हरजाने के रूप में बड़ी राशि वसूल की गई। संधि वार्ता चल रही थी, रघुनाथ सिंह आश्वस्त थे कि उन पर आक्रमण नहीं होगा इसीलिए उन्होंने कोई सैनिक तैयारी नहीं की।

 

मराठों ने धोखा दिया यह बात बाबू रेवाराम नहीं लिख सके क्योंकि मराठा राजा रघु की आज्ञा से वे तवारिख श्री हैहयवंशी राजाओं की लिखे है।34

सन् 1741 ई. में रतनपुर पर आक्रमण के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती। मराठों के विवरण बंगाल पर केन्द्रित है। रतनपुर में लड़ाई हुई यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है। बिना लड़े समर्पण वाली बात सही नहीं है। लड़ाई के कुछ विवरण मिलते हैं। प्यारे लाल गुप्त ने लिखा है - सन् 1741 ई. में तत्कालीन जमींदार राघोसिंह को जब वह रतनपुर किले का बचाव कर रहा था, मराठों ने मार डाला।35 जमींदार मारा गया इससे साफ होता है कि उसके साथ सैनिक भी रहे होंगें। भले ही कुछ सौ रहे हो। रघुनाथ सिंह वैसी तैयारी नहीं कर पाए  जैसे की करनी चाहिए थी, इसीलिए मि. चिशोम जैसे लेखकों ने कलचुरि राजा की तीखी आलोचना की है।

 

अचानक मराठा सैनिकों द्वारा किलों को घेर लेने से रघुनाथ सिंह किंकर्तव्य विमूढ़ हो गए, अपने राजा पर हुए आक्रमण का सामना करने के लिए जमींदार सामने आए, छुरी के जमींदार राघोसिंह व उसके साथियों की लड़ाई यही सिद्ध करती है। यह आश्चर्य की बात है कि रतनपुर राजा के पास तोपखाना था, जिसके प्रयोग की कोई जानकारी नहीं है। राजा कल्याण साय की सेना का जो विवरण मिलता है, उसमें तोपखाना के बारे में कुछ नहीं बताया गया है। बंदूकधारियों की संख्या 3600 लिखा है तथा 116 हाथी लिखा है।36 यह विवरण मिलता है कि जब किले पर गोलाबारी की गई और उसका एक भाग उड़ा दिया, तब राजा रघुनाथ सिंह की पत्नी लक्ष्मण कुंवर और पद्म कुंवर ने आपस में सलाह कर किले के बुर्ज से सुलह का सफेद झंडा फहराकर लड़ाई बंद कर दी थी। किले के फाटक मराठों के लिए खोल दिये गये। मराठा सेना किले के भीतर घुस आई। राजधानी रतनपुर पर मराठों का अधिकार हो गया। रानियों द्वारा सुलह का झंडा फहराना यह प्रमाणित करता है कि रानियां बुद्धिमती थी, और उन्हें इस प्रकार के बड़े निर्णय लेने के अधिकार थे जो कि प्रशासन में नारियों की भागीदारी का सुंदर उदाहरण है।

 

बाबू रेवाराम ने लिखा - सन् 1741 ई. में भोंसलों ने अपना पहला आक्रमण रतनपुर पर किया और किले को चारों ओर से घेर लिया। किला अत्यंत मजबूत था, इसलिए भास्कर पंत की सेना कुछ नहीं कर सकी परन्तु भास्कर पंत ने अपनी चतुराई से वहीं के लोगो को अपने वष में किया और किले का मुख्य द्वार फोड़कर वे अंदर घुस गए। अंदर भयंकर मारकाट हो गई। इस दृश्य को देखकर रघुनाथ सिंह की दोनों पत्नियों ने सफेद वस्त्र दिखाकर युद्ध समाप्त किया जिसके कारण भास्कर पंत ने युद्ध को रोक दिया। शर्त के मुताबिक मराठों ने एक लाख रूपए हरजाने के रूप में वसूल किया।37

 

मराठा आक्रमण की सफलता

मराठों का रतनपुर के कलचुरियों पर प्राप्त विजय अनेक प्रश्न चिन्हों को छोड़ते है। रघुनाथ सिंह के पराजय के कारण ढूंढने दूर तक जाने की आवश्यकता नहीं हैं। रघुनाथ सिंह का यह करना था, यह नहीं करना था, इस प्रकार की बातें की जाती है। परिणामों के आधार पर समीक्षा करते डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने लिखा है- कम से कम डेढ़ सहस्त्र सालों तक अविछिन्न रूप से राज्य करने वाले कलचुरि राज घराना इस प्रकार पानी के बुलबुले के समान एक ही फूंक में विलीन हो गया।38

 

प्यारे लाल गुप्त ने 1923 में लिखा- इसमें संदेह नहीं कि रक्षा का जैसा भी उत्तम उपाय किया जाता मराठों से पार पाना कठिन था, पर इतिहास को इस बात से संतोष नहीं, वह चाहता है कि हैहय सदृश्य वीर और प्राचीन घराने का वंशज स्वदेश की रक्षा हेतु समर में या तो विजय प्राप्त करता या हाथ में तलवार लिए प्राण देता और इस प्रकार अपनी स्वदेश भक्ति और शूरता की की छाप भावी पीढ़ी के हृदय में जगा जाता, पर रघुनाथ सिंह से कुछ नहीं बन पड़ा और पूरा छत्तीसगढ़. मराठों के अधिकार में आ गया।39

 

प्यारे लाल गुप्त ने लिखा है- यदि राजा रघुनाथ सिंह कमर कसकर छत्तीसगढ़ के विभिन्न गढ़ों में बिखरी हुई सेना एकत्र करते और भास्कर पंत का मुकाबला बरते तो आश्चर्य नहीं कि पासा पलट जाता लेकिन इस प्रकार का कोई प्रयत्न नही हुआ।40 प्रो. जे. आर. वर्ल्यानी एवं व्ही.डी.साहसी ने लिखा है - छत्तीसगढ़ में कलचुरि शासन की स्थापना जिस गौरवमय ढंग से हुई थी, उस शासन का अंत उतने ही नाटकीय ढंग से हुआ। चाहते तो रघुनाथ सिंह दृढ़ता पूर्वक छ.ग. के विभिन्न गढ़ों में बिखरी सेना को संगठित कर भास्कर पंत की सेनाओं का डटकर मुकाबला कर सकते थे। पासा पलट सकते थे, लेकिन रघुनाथ सिंह ने अपनी ओर से प्रतिरोध करने का तनिक भी प्रयास नहीं किया।41

 

रतनपुर के राजा को जिस वीरता, साहस व दूरदर्शिता का प्रदर्शन करना चाहिए था उसने नहीं किया। मि. चिशोम की तीखी टीप इसी संबंध में है। रतनपुर का राजा भले ही बड़े संघर्ष के लिए तैयार न था परंतु रतनपुर का गढ़ ऐसे ही मराठों के अधिकार में नहीं आ गया।

 

यद्यपि राजा ने युद्ध में स्वयं भाग नहीं लिया, आत्मघाती युद्ध में जिसकी पूरी व्यवस्था राज्य के दीवान व अन्य अधिकारियों ने की थी।42 सन् 1741 ई. में छत्तीसगढ़. से कलचुरि शासन की समाप्ति और मराठों के वर्चस्व की घोशणा की।

 

मराठा आक्रमण के परिणाम

सन् 1741 में मराठों ने रतनपुर पर आक्रमण किया। इस आक्रमण ने छत्तीसगढ़. के भविष्य को परिवर्तित कर दिया। महान मुगलो के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाला छत्तीसगढ़. मराठों के अधिकार में चला गया। सन् 1741 ई. में परिवर्तन की प्रक्रिया का प्रारंभ हुआ। अंचल में इस आक्रमण के परिणामों के निम्न शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है।

 

1. मराठे विजयी हुए

सन् 1741 ई. में रतनपुर पर हुए आक्रमण का पहला परिणाम यह निकला कि सैकड़ों सालों में छत्तीसगढ़. पर स्थापित कलचुरियों का राज्य समाप्त हो गया। विजयी मराठों ने पहली सफलता के साथ विजय अभियान को आगे बढ़ाया। पुराने कलचुरि राजा के स्थान पर नए व्यक्ति को रतनपुर का शासन भार सौंपा। यह नया व्यक्ति पुराने राजवंश की समाप्ति का प्रतीक था। सेनापति भास्कर पंत मराठा सेना को विजयी दिलाने में सफल हो गए।

 

2. कलचुरियों की दुर्बलता का ज्ञान

जय-पराजय होता रहता है। 1741 ई. में मराठों की जय और कलचुरियों की पराजय इसी श्रृंखला की एक कड़ी थी। पराजय के कलंक से अधिक कलंक कलचुरियों को लगा। कलचुरियों की दुर्बलता का ज्ञान हुआ। सैकड़ों सालों से रतनपुर पर राज कर रहे कलचुरि इतने कमजोर हो गए हैं, यह इस अंचल के लोगों को भी ज्ञात नहीं था। जय-पराजय की परवाह न करते हजारों सैनिक समरांगण में उतरते, उनका सेनापति लड़ता हुआ मारा जाता तो इतिहास कलचुरियों को माफ कर देता। वीर भोग्या वसंुधरा... प्राचीन कहावत है जो कायरता तत्कालीन कलचुरि षासक ने दिखाई उससे छत्तीसगढ़. का सर नीचा हुआ।

 

3. कलचुरियों का खजाना मराठों के अधिकार में

सन् 1741 ई. में रतनपुर पर मराठों के आक्रमण का एक प्रमुख कारण मराठा सरदार रघुजी भोंसले की आर्थिक परेशानी थी। इस परेशानी के चलते ही बंगाल की राह पर पड़ने वाले रतनपुर पर आक्रमण किया गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि रघुनाथ सिंह से संधिवार्ता इसी मुद्दे पर अटक गई थी मराठे उनसे अधिक से अधिक धन ऐठना चाहते थे। संधि वार्ता के मध्य ही मराठों ने आक्रमण कर कलचुरियों को को परास्त कर खजाने पर अधिकार कर लिया। इस खजाने में क्या था, इसका विवरण नहीं मिलता। मराठा सरदारों ने कितना भाग लिया, रघुजी को कितना दिया कोई विवरण नहीं मिलता। रतनपुर का राज्य समृद्धषाली राज्य था। ऐसी स्थिति में खजाने से नगद और सोना चांदी के जेवरात, बर्तन के रूप में 50 लाख रूपयों की प्राप्ति सहज ही अनुमान लगाई जा सकती हे। रूपयों की लूट ही रतनपुर पर मराठा आक्रमण का मूल कारण था, यह सर्वज्ञात तथ्य है। इस लूट ने राज परिवार को दयनीय व शोचनीय स्थिति में ला दिया।

 

4. रतनपुर के नागरिकों से वसूली

कलचुरि राजा का खजाना लूट कर ही मराठों को संतोष नहीं हुआ। विजयी सेना पराजित क्षेत्र को लूटती है, मराठे इस मामले में ज्यादा ही बदनाम थे। मराठों का इतिहास लूटमार का इतिहास रहा है। रतनपुर के समृद्ध नागरिकों को आमंत्रित कर मराठों ने नगर की लूट के एवज में धनराशि मांग की। समझौता वार्ता का दौर चला और अंत में एक लाख रूपये नगद पर समझौता हुआ। मि. चिशोलम ने लिखा है- रतनपुर के लोगों को आतंकित करने की दृष्टि से वहां के निवासियों पर एक लाख रूपयों का जुर्माना किया गया।43

 

5. रघुनाथ सिंह पद पर बने रहे

मराठों ने रतनपुर को जीतने के बाद भी कलचुरि नरेश रघुनाथ सिंह को प्रमुख के रूप में बने रहने दिया। राजा के स्थान पर उसे सामंत नरेश बनाकर छोड़ दिया गया। बहुत संभव है, समय की कमी के कारण भास्कर पंत को नई व्यवस्था करने में सफलता नहीं मिल पाई हो, वैसे भी रतनपुर में कोई खास विकल्प नहीं था। एक संभावना यह भी बनती है कि जिन रानियों ने सुलह का झंडा फहरा कर विजय को आसान बनाया था, उनके प्रति कृतज्ञता के भाव से पं. भास्कर पंत ने पुरानी व्यवस्था को ही आंशिक परिवर्तन के साथ चलने दिया हो। किसी ठोस आधार के प्रमाण के साथ कुछ कहना संभव नहीं है। भास्कर पंत की नई व्यवस्था यद्यपि जल्दबाजी में लागू की गई थी, मगर बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय था। बंगाल पर आक्रमण के लिए मराठा सेना को आगे बढ़ना था, यह भी ध्यान रखना था कि पीछे से मराठों पर वार न हो, इसलिए पराजित राजा के प्रति सदाशयता का परिचय देना समय की मांग थी, वक्त का तकाजा था, एक अनिवार्य आवश्यकता थी। धन की आवश्यकता थी उसकी पूर्ति राजा के खजाने की लूट से हो गई थी। रतनपुर के राजा को अशक्त सामंत राजा बनाकर छोड़ दिया गया था। उसने भोंसला शासन के प्रतिनिधि के रूप में रघुनाथ सिंह को रतनपुर पर शासन करने का अधिकार पुनः दे दिया, परंतु अपने स्वामी के हितों की देखभाल के लिये उसने वहॉं कुलीनगीर नामक व्यक्ति को नियुक्त किया।44

 

6. भास्कर पंत को रघुनाथ सिंह की आह लगी

सन् 1741 ई. में रघुनाथ सिंह पर मराठा सरदार भास्कर पंत ने धोखे से आक्रमण किया था, उसे पराजित कर अपमानित किया था। कहा जाता है कि इतिहास अपने को दोहराता है। भास्कर पंत के मामले में यह सौ फीसदी सही साबित होता है। सन् 1741 ई. में धोखे से रघुनाथ सिंह का रतनपुर राज, छिनने वाले भास्कर पंत को तीन साल के भीतर ही धोखे का सामना करना पड़ा।

 

सन् 1744 ई. में भास्कर पंत और बंगाल के अलिवर्दी खां की संधि हुई परंतु छलकपट के द्वारा अलिवर्दी खां ने सैनिकों के द्वारा मनकुटा नामक स्थान पर भास्कर पंत एवं उसके 20 सैनिक-सरदारों को मार डाला।45 अकारण रतनपुर पर आक्रमण और रघुनाथ सिंह को धोखा दिया इसलिए परेशान करने से व्यथित राजा की आह भास्कर पंत को लगी। रघुनाथ सिंह को धोखा दिया इसलिए बंगाल में धोखा खाया। रघुनाथ सिंह के तो प्राण बच गए मगर भास्कर पंत को प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

 

7. रघुनाथ सिंह नियंत्रण मुक्त हुए

सन् 1741 ई. में भास्कर पंत ने रतनपुर के राजा को परास्त किया और रतनपुर पर अधिकार कर लिया। राजा को सामंत राजा बनने को विवष किया अपने प्रतिनिधि के रूप में एक व्यक्ति को छोड़ा। इस व्यक्ति का नाम क्या था इस पर मतभेद हैं। प्यारे लाल गुप्त के अनुसार- रतनपुर से चलने से पहले एक गुसाई को रतनपुर में अपने प्रतिनिधि बनाकर छोड़ दिया था।46 डॉ. भगवान सिंह के अनुसार कुलीनगीर नामक व्यक्ति को छोड़ा गया था।47 प्यारे लाल गुप्त के अनुसार- राजा रघुनाथ सिंह पर भास्कर पंत ने इतनी कृपा की कि उसे नाम का राजा बने रहने दिया और कल्याण गिरि गुसाईं को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर वहां से रवाना हो गया।48 डॉ. मुकुंद रंगनाथ49, वर्ल्यानी एवं साहसी50 बाबू रेवाराम ने लिखा है- राजा को शिकस्त करके अपने मुख्यत्यार कल्याण गिर को अकत्यार, रियासत करके राज पर अमल पूना की मुनादी कर राजा को गद्दी में रख के बंगाल को गए।51

 

रघुनाथ सिंह और कल्याणगिरि को मिलकर कार्य करना था, मगर ऐसा नहीं हुआ दोनों में पटरी नहीं बैठी।52 रघुनाथ सिंह ने कड़ा कदम उठाते हुए भोंसले प्रतिनिधि कल्याणगिर को गिरफ्तार कर लिया। रघुजी के लिए यह चुनौती थी। संप्रभु यह कैसे सह सकता था कि उसे प्रतिनिधि को पराजित राजा गिरफ्तार कर ले। रघुजी को रतनपुर पर आक्रमण करना पड़ा और सन् 1745 ई. में रघुनाथ सिंह का प्रकरण समाप्त हुआ। रायपुर शाखा के मोहनसिंह को रतनपुर का प्रबंधक नियुक्त किया गया।

 

8. छत्तीसगढ़ चारागाह बना

सन् 1741 ई. में रतनपुर पर आक्रमण अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। अंचल के इतिहास का यह निर्णायक मोड़ था, इसके दूरगामी परिणाम हुए। मराठों की विजय ने अंचल को चारागाह बना दिया। शासक और शासित के मध्य केवल धन का संबंध रह गया। शासक को कर वसूलना था, शासित को कर पटाना था। आंचलिक इतिहासकार प्यारे लाल गुप्त ने लिखा है-मराठों ने राज्य की उन्नति की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। हैहयवंशी राज प्रणाली को ही अपना कर अपनी जरूरत के मुताबिक यहां-वहां सुधारकर वे अपना काम निकालते रहे, पर इनके और हैहयवंशी राजाओं के विचारों में बड़ा अंतर था। हैहयवंशी अपने को प्रजाप्रिय बनाना चाहते थे। मराठों को केवल धन से मतलब था। ये प्राचीन प्रथा का कुछ भी सम्मान नहीं करते थे। न इनमें वे गुण थे जो मूक प्रजा के शासक में होने चाहिए।54 यह मूलभूत अंतर था इसलिए अतिशय लूटमार होने पर छत्तीसगढ़. में कहा जाता है- क्या भोंसलाशाही मचा रखे हो।

 

सन् 1741 ई. में राजा रघुनाथ सिंह की ही पराजय नहीं हुई बल्कि राजा और प्रजा के उस रिश्ते का भी अंत हो गया जो प्रजा को राजा और राजा को प्रजा के दुख-सुख का भागीदार बनाता था। धन वसूलने वाले भोंसला के अधिकारियों ने छत्तीसगढ़. के निवासियों पर अत्याचार, व अनाचार किया, इसे वे चारागाह के रूप में प्रयुक्त करते थे। कम समय में अधिक से अधिक धन वसूल कर अपना स्वार्थ लाभ करते थे। यद्यपि बिम्बाजी भोंसले ने छत्तीसगढ़ में रह कर राज किया और धीरे-धीरे लोकप्रियता प्राप्त की मगर उसके पश्चात् सूबा षासन ने छत्तीसगढ़ का आर्थिक शोषण किया। यहां के लोग गरीब से और गरीब होते गए। मराठा इतिहासकार छत्तीसगढ़. में मराठा शासन को प्रजा के लिए हितकर बताने का प्रयास करते हैं मगर तथ्य इसके मेल नहीं खाते। गरीबी अनेक प्रकार से व्यक्ति और अंचल को कमजोर बनाता है। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हुआ। 

 

संदर्भ सूची:-

1.     प्रथम जाजल्ल देव का रतनपुर शिलालेख 8 नवंबर 1114 ई. एवं एपिग्राफिका इंडिया जिल्द 1पृ. 33

2.     मेमायर्स ऑफ जहांगीर, (संपादक हेनरी वेबरीज) अनुवादक अलेक्जेण्डर राजरर्स जिल्द 2-3, 1914पृ. 93

3.     जहांगीर नामा या तुजुक ए जहांगीरी, (संपादक हेनरी बेवरीज,) जिल्द 2 पृ. 93 में विवरण है.... शनिवार के दिन 15 ताः को खुरदाद करते हुए उसका सुलतान परवेज इलाहाबाद से आया। वहां रतनपुर का जमींदार था, उसने कल्याण सहाय के विरूद्ध सेना भेजी, परंतु उसने एक लाख रूपए कर तथा 80 हाथी दिए,

4.     चिशोल्म, जे डब्ल्यू, रिपोर्ट ऑन द लैंड रेवेन्यू सेटलमेंट ऑफ द बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट नागपुर, 1868, पृ.30

5.     उपरोक्त, पृ. 30..

6.     सरदेसाई,जी.एस., न्यू हिस्ट्री ऑफ मरहट्टा, जिल्द 1 एवं 2, 1944, पृ. 210

7.     उपरोक्त पृ. 8

8.     एगन्यू,पी.वान्स, ए रिपोर्ट ऑन द सूबा ऑफ छत्तीसगढ़, शासकीय प्रकाशन नागपुर,,1820 ई.,पृ.3

9.     शास्त्री, पं. शिवदत्त रतनपुर आख्यान, अप्रकाशित

10. बाबू रेवाराम, रतनपुर का इतिहास, पृ.12

11. शर्मा, ज्ञानेश्वर प्रसाद, मराठा रूल इन छत्तीसगढ,़ पृ. 22

12. मुकुन्द रंगनाथ, छत्तीसगढ़ में मराठा शासन बिम्बाजी भोंसले, अप्रकाशित शोध प्रबंध पृ. 6

13. मिश्रा, पी.एल.,द पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ छत्तीसगढ़, रायपुर, 1999, पृ.1

14. उपरोक्त, पृ. 41

15. मिश्र, बलदेव प्रसाद, छत्तीसगढ़ परिचय, हिन्द प्रकाशन बिलासपुर,,1960, पृ. 120

16. गुप्ते काशीनाथ, नागपुर कर भोसल्यांची बखर, (मराठी) पृ. 30

17. पूर्वोक्त पृ. 47

18. सिलेक्सन्स फ्रॉम सतारा राजास एन्ड पेशवास डायरिस, ग्रंथ 1, क्र. 163 से 167

19. सरदेसाई.जी.एस., सिलेक्सन फ्रॉम पेशवा दफतर, ग्रंथ 20 से 28

20. गुप्त, प्यारे लाल, प्राचीन छत्तीसगढ़, रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर, 1973, पृ. 111

21. गुप्त, प्यारे लाल, श्री विष्णु महायज्ञ स्मारिका, 1944, पृ. 105

22. उपरोक्त

23. गुप्त, प्यारे लाल, बिलासपुर वैभव, छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली बिलासपुर, म.प्र., 1923, पृ. 27

24. शुक्ल, प्रयाग दत्त, मध्य प्रदेश का इतिहास और नागपुर के भांसले,1930, पृ. 38

25. मिश्र बलदेव प्रसाद, छत्तीसगढ़ परिचय, पूर्वोक्त,पृ. 26, 27

26. प्रथम पृथ्वीदेव का आमोदा ताम्रपत्र एवं एपिग्राफिया इंडिया ग्रंथ 19 पृ. 75

27. मुकुन्द रंगनाथ, छत्तीसगढ़ में मराठा शासन और बिम्बाजी पूर्वोक्त,, पृ. 78

28. गुप्त, प्यारे लाल, बिलासपुर वैभव, पूर्वोक्त, पृ. 12

29. पूर्वोक्त पृ. 47

30. गुप्ते, काशीनाथ, भांेसला घराना, 1818 ई. उद्धृत

31. शास्त्री, पं. शिवदत्त, पूर्वोक्त, पृ. 73

32. गोकुल प्रसाद, दुर्ग दर्पण, 1923, पृ. 73

33. बाबू रेवाराम, वंषावली राजेश्री जमींदार लाफावाले प्रांत छत्तीसगढ़

34. बाबू रेवाराम, तवारिख श्री हैहयवंशी राजाओं की भूमिका

35. गुप्त, प्यारे लाल, प्राचीन छत्तीसगढ़, पूर्वोक्त,, पृ. 247

36. चिषोल्म, सेटलमेन्ट रिपोर्ट, पूर्वोक्त, पृ. 29

37. बाबू रेवाराम, रतनपुर का इतिहास पृ.12

38. मिश्र, बलदेव प्रसाद, छत्तीसगढ़ परिचय, पूर्वोक्त, पृ.112-113

39. गुप्त, प्यारे लाल, बिलासपुर वैभव, पूर्वोक्त पृ. 27,28

40. गुप्त, प्यारे लाल, प्राचीन छत्तीसगढ़, पूर्वोक्त, पृ. 112

41. वर्ल्यानी, ज.े आर. व साहसी,वी.डी., छत्तीसगढ़ का राजनैतिक सांस्कृतिक इतिहास, दिव्या प्रकाषन कांकेर, 1997, पृ. 67

42. षर्मा, ज्ञानेष्वर प्रसाद, मराठा रूल इन छत्तीसगढ़, पृ. 102

43. चिषम, सेटलमेन्ट रिपोर्ट, पूर्वोक्त, पृ. 30

44. वर्मा, भगवान सिंह, छत्तीसगढ़ का इतिहास, मध्यप्रदेष हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल, 2003 पृ. 52

45. मुकुद रंगनाथ, छत्तीसगढ़ में मराठा षासन और बिम्बाजी भोंसले, पूर्वोक्त,, पृ. 7

46. गुप्त, प्यारे लाल, श्री विष्णु यज्ञ स्मारिका, पूर्वोक्त,, पृ. 105

47. वर्ल्यानी, जे आर व साहसी, वी.डी.,पूर्वोक्त, पृ. 35

48. गुप्त, प्यारे लाल, पूर्वोक्त, पृ. 112

49. मुकुद रंगनाथ, छत्तीसगढ़ में मराठा षासन और बिम्बाजी भोंसले पृ. 7

50. वर्ल्यानी, जे आर व साहसी,वी.डी., पूर्वोक्त, पृ.63

51. बाबू रेवाराम, तवारिख श्री हैहयवंषी राजाओं की भूमिका पृ.53

52. गुप्त, प्यारे लाल, पूर्वोक्त पृ. 113

53. वर्मा, भगवान सिंह, छत्तीसगढ़ का इतिहास, पूर्वोक्त, पृ.52

54. गुप्त, प्यारे लाल, बिलासपुर वैभव पृ. 33 

 

 

Received on 26.04.2025      Revised on 17.05.2025

Accepted on 30.05.2025      Published on 04.06.2025

Available online from June 07, 2025

Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(2):85-94.

DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00014

©A and V Publications All right reserved

 

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License. Creative Commons License.